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अत्राह॑ ते हरिव॒स्ता उ॑ दे॒वीरवो॑भिरिन्द्र स्तवन्त॒ स्वसा॑रः। यत्सी॒मनु॒ प्र मु॒चो ब॑द्बधा॒ना दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं स्यन्द॒यध्यै॑ ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atrāha te harivas tā u devīr avobhir indra stavanta svasāraḥ | yat sīm anu pra muco badbadhānā dīrghām anu prasitiṁ syandayadhyai ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अत्र॑। अह॑। ते॒। ह॒रि॒ऽवः॒। ताः। ऊ॒म् इति॑। दे॒वीः। अवः॑ऽभिः। इ॒न्द्र॒। स्त॒व॒न्त॒। स्वसा॑रः। यत्। सी॒म्। अनु॑। प्र। मु॒चः। ब॒द्ब॒धा॒नाः। दी॒र्घाम्। अनु॑। प्रऽसि॑तिम्। स्य॒न्द॒यध्यै॑ ॥७॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:22» मन्त्र:7 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (हरिवः) श्रेष्ठ पुरुषों से और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (अत्र) इस राज्य में (अह) ग्रहण करने में (यत्) जो (ते) आपकी (बद्बधानाः) प्रबन्ध करनेवाली (स्वसारः) अङ्गुलियों के समान वर्त्तमान बहिनपने का आचरण करती और पढ़ी हुई स्त्रियाँ (स्यन्दयध्यै) बहाने को (दीर्घाम्) लम्बीभूत (प्रसितिम्) बन्धावट की (अनु, स्तवन्त) अनुकूल स्तुति करती हैं (ताः, उ) उन्हीं (देवीः) प्रकाशित पढ़ी हुई स्त्रियों को (अवोभिः) रक्षण आदि व्यवहारों से (सीम्) सब प्रकार दुःखरूप बन्धन से आप (अनु, प्र, मुचः) अच्छे प्रकार छुड़ाइये ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे राजा आदि मनुष्यो ! जैसे आप लोग ब्रह्मचर्य से विद्याओं को पढ़कर राजनीति से राज्य का पालन करते हैं, वैसे ही आप लोगों की स्त्रियाँ स्त्रियों का न्याय करें। ऐसा करने पर दृढ़ राज्यधर्म्म का प्रबन्ध होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥७॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे हरिव इन्द्र ! अत्राऽह यद्या ते बद्बधानाः स्वसार इव वर्त्तमाना विदुष्यस्स्त्रियः स्यन्दयध्यै दीर्घां प्रसितिमनु स्तवन्त ता उ देवीरवोभिः सीं दुःखबन्धनात्त्वमनु प्र मुचः ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अत्र) अस्मिन् राज्ये (अह) विनिग्रहे (ते) तव (हरिवः) प्रशस्तपुरुषयुक्त (ताः) (उ) (देवीः) देदीप्यमाना विदुष्यस्स्त्रियः (अवोभिः) रक्षणादिभिः (इन्द्र) परमैश्वर्य्ययुक्त राजन् (स्तवन्त) स्तुवन्ति (स्वसारः) अङ्गुल्य इव मैत्रीं भगिनित्वमाचरन्त्यः (यत्) याः (सीम्) सर्वतः (अनु) (प्र) (मुचः) मोचय (बद्बधानाः) प्रबन्धकर्त्र्यः (दीर्घाम्) लम्बीभूताम् (अनु) (प्रसितिम्) बन्धनम् (स्यन्दयध्यै) स्यन्दयितुं प्रस्रावयितुम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे राजादयो मनुष्या ! यथा भवन्तो ब्रह्मचर्य्येण विद्या अधीत्य राजनीत्या राज्यं पालयन्ति तथैव भवतां स्त्रियः स्त्रीणां न्यायं कुर्युरेवं कृते सति दृढो राजधर्मप्रबन्धो भवतीति वेद्यम् ॥७॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे राजा इत्यादी माणसांनो ! तुम्ही जसे ब्रह्मचर्याने विद्या शिकून राजनीतीने राज्यपालन करता तसेच तुमच्या स्त्रियांनी स्त्रियांचा न्याय करावा. असे करण्यामुळे दृढ राजधर्माचे व्यवस्थापन होते. ॥ ७ ॥